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रे मन !
रे मन ! छोड़ सुख की आस |
सुख मिलते ही इश्वर को, तू भूलेगा अनायास ||
ये जड़ है विपत्ति की, यही कर रहा जग का नाश |
फिर क्यों तू सुख के लिए, रहता है दिन रेन उदास ||
सुख-दुःख है धूप-छांव सी, होता है आवास-प्रवास |
अंधेरी रात के बाद ही तो, मिलता है सबको प्रकाश ||
जिसने भी है त्यागा इसे, रचा उसने नया इतिहास |
जिसने भी है स्वामी माना, उसे बनाया इसने लाश ||
दुःख ही तो है मित्र तेरा, हर दर्द में रहता तेरे पास |
गर तू दुःख को साथी कर ले, सुख भी होगा तेरा दास ||
posted by Harish Chandr @ 8:12AM on date 23-02-2011
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4 comments
सही कहा .. दुःख ही सच्चा साथी है .. वही हमेशा साथ निभाता है .. सुख तो कटरीना कैफ जैसी है तो दूर से ही जीभ चिढ़ा के भाग जाती है |
commented by Ishwinder Singh Pujji @ 11:46PM on date 30-06-2011
great ! Harish ji
commented by Bang prasad vaidya @ 3:27PM on date 23-05-2011
nice thought.. and very well written..
keep it on..
commented by streetboy @ 9:35PM on date 16-05-2011
इन्सान का मन तो बड़ा ही चंचल होता है,
और जो इसे वश में कर ले, वो महान होता है...
commented by Shankar Das @ 7:15PM on date 23-02-2011
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